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हैड़ाखान सिद्धाश्रम के शिवस्वरूप 1008 श्री मौनी बाबा

हैड़ाखान सिद्धाश्रम के शिवस्वरूप 1008 श्री मौनी बाबा

संतो के विषय में कहा गया है कि ‘‘ जयंति ते सुकृतिनो ब्रह्मा वेत्ता तपस्वना:। नास्ति येयाम् यश: काये जरा मरणजम् भयम्।’’ वे संत पुरूष धन्य हैं, जो ब्रह्म ज्ञान को जान चुके हैं, जिनकी यश रूपी काया को न तो वृद्धावस्था का भय है, नही मृत्यु का। संतो में ऐसे ही संत हुए हैं, श्री हैड़ाखान सिद्धाश्रम सीतलाखेत, अल्मोड़ा के परम् पूज्नीय शिवस्वरूप 1008 श्री मौनी बाबा। उनका असल नाम तो किसी को ज्ञात नहीं किंतु लगातार 60 वर्षों तक मौन साधना की इसलिए मौनी बाबा के नाम से ही विख्यात हुए।

 बाबा का ज्यादातर जीवन निराहार व निर्जल ही बीता बताया जाता है। पावन नगरी रिषिकेश के एक उच्च कुलीन ब्राह्मण परिवार के आयुर्वेदाचार्य और राजवैद्य के घर सन् 1880 में जन्मे। ग्यारह वर्ष की अल्पायु में स्थानीय शिक्षा समाप्त कर वे बनारस गये। वहां गंगा घाट पर भेंट हुई श्री साम्ब सदाशिवरूप 1008 श्री हैड़ाखान महाराज से। वहीं उन्होंने गायत्री मंत्र दीक्षा प्राप्त की श्री हैड़ाखान महाराज से और यह आशीष भी उन्हें मिला कि आगे चलकर इसी मंत्र के प्रताप से अनेकों मंत्रों की रचना करेंगे। श्री हैड़ाखान महाराज यथार्थत: त्रिकालज्ञदर्शी तो थे ही। उनका व्यक्तित्व लाखों संतों में एक था। आजान बाहु न झपकती पलकें तथा मुख मंडल पर विराजती अति विशिष्ट तपस्या की आभा। ऐसे गुरू ने स्वयं खोज निकाला था अपने इस अद्वितीय शिष्य को उसकी छोटी उम्र में।‌‌‌जन कल्याण की प्रेरणा, पारिवारिक विरासत के रूप में मिली तपस्या आयैर साधना ने किया भावी वैराग्यमय जीवन के नींव के पत्थर का कार्य और उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने आयुर्वेदाचार्य, संस्कृताचार्य की डिग्रीयों से मिला एक ठोस धरातल जिसने सीतावनी के क्षेत्रा में एक तपस्वी जीवन को जन्म दिया।

ग्यारह वर्ष की शिक्षा के उपरांत लौटे किशोर उम्र के बाबा को मॉं-बाप ने भी पूरी तरह स्वीकृति दे वैराग्य मार्ग पर प्रशस्त किया। मुनि श्रेष्ठ अजर-अमर श्री मार्कण्डेय की तरह बालक की 24 वर्ष की कुल आयु के बाद सांसारिक जीवन समाप्त होना था और यह तथ्य ज्ञात था केवल बाबा के पिताश्री को। यह भले ही गुरू-कृपा प्रसाद रहा हो या पिताश्री का शुभाशीष जिसने बाबा को तपस्वी जीवन दिया। सीताबनी निर्जन वन था जिसके बारे में किंवदंती है कि वहां जगदम्बा स्वरूपा मां श्री सीताजी ने वाल्मीकि के आश्रय में रहकर लव-कुश दो पुत्रो को जन्म दिया था व पालन पोषण किया था। उक्त वन तपस्थली के रूप में उपयुक्त था भी जहां बाबा ने एक वृक्ष के सहारे मचान बनाकर नीचे धूनी रमाई और तप साधना प्रारम्भ की।

 घर से एक लंगोटी-वस्त्र लेकर निकले बाबा को कब परवाह थी भोजन और पानी की। ‘‘झोली में राखे नही,मॉंगन में सकुचाए, तिनके पीछे प्रभु फिरें, कहीं भूखे न रह जाय’’ को चरितार्थ करते हुए, तप में लीन हो गये। तभी एक दिन स्वयं गुरूदेव श्री हैड़ाखान बाबाजी पधारे औश्र संत को स्थाई विकल्प के रूप में एक कंद बताया और उसके उपयोग की विधि भी समझाई। साथ ही एक कमंडलु और एक दो अन्य पात्र भी दिये। अब पूरी तरह निर्बाध हो गई ये तप साधना। हालांकि वह हिंसक पशुओं का क्षेत्र था तथापि साठ वर्ष बीते तप करते करते। दिन रात महिने और वर्षों ने कई करवटें लीं पर तपस्वी बाबा ने नहीं। हां जन कल्याण अवश्य करते रहे इन लंबे वर्षो में, अपनी आयुर्वेद विद्या से हजारों ग्रामीणों को जीवन-दान दिया। उनकी व्याधि हटाई तथा अपने दर्शन दे कृतार्थ किया। परिवर्तन शील जगत में इस बीच कई परिवर्तन हुए पर वह क्षेत्र खासकर तपस्थली सीताबनी अप्रभावित रही।

इसी क्षेत्र में अपनी अभूतपूर्व साधना के फलस्वरूप 19,15, 11, 11 व 9 दिनों की कई समाधियां लीं बाबा ने।  परम् ब्रह्म से साक्षात्कार, योग साधना और उस व्यापक चैतन्य पुरूष के स्थावर और जंगम सबमें दर्शन किये। गंगा परिक्रमा के अंतर्गत आपको श्री उपमन्यु महाराज, श्री भृतहरि, श्री गोपीचंद आदि जैस उत्तराखंडीय अजर अमर तपस्वियों के दर्शन हुए। श्री मॉ आद्या शक्ति जगदम्बा ने भी संध्या के समय एक बार साक्षात् दर्शन दिये।

1950 के उत्तरार्ध याने अंतिम महिनों में पूज्यनीय 1008 श्री मौनी बाबा  उस तपस्थली से नाता तोड़कर पर पूज्यनीय श्री हैड़ाखान महाराज के सिद्धाश्रम सीतलाखेत, अल्मोड़ा आ गए। उनके साथ उनकी एक शिष्या औश्र एक मात्र सेविका श्री शांतामाई भी आईं। अपने गुरूदेव की आज्ञा से इस नये स्थान को एक नया स्वरूप देकर शिवमंदिर औश्र आश्रम का निर्माण किया। पूर्व की ओर श्री हैड़ाखान महाराज द्वारा प्रकट की गई जल धारा के निकट ही दो देवदार के वृक्ष नर और नारायण पूर्व से ही, श्री बाबा द्वारा रोपे हुए, निर्बाध गति से बढ़ते ये वृक्ष आज भी यशोगान करते रहते हैं उस परम ब्रहम का और उन्हे रोपने वाले श्री मौनी बाबा का।

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