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शिव पुराण में शिवतत्व शिव पुराण में शिवतत्व

शिव पुराण में शिवतत्व शिव पुराण में शिवतत्व

देवों में देव महादेव सदाशिव भी हैं। प्रलय का अवसान होने पर पुन: सृष्टि के प्रारंभ पूर्व जब परब्रह्म सृष्टयुन्यमुख होते हैं, तब वे परमेश्वर(परात्पर) सदाशिव कहलाते हैं। वहीं सृष्टि के मूल कारण हैं मनुस्मृति में इन्हें ‘स्वयम्भू’ भी कहा है।

तत: स्वयम्भूर्गवानव्यक्तो व्यंजयन्दिम्। महाभूतादि वृत्तौजा: प्रादुरासीत् तमोनुद:।।

तब स्वयम्भू’ भगवान अव्यक्त होने पर भी प्रलय के तम को दूर कर प्रकाशित हुए और महाभूत एवं अन्य सब बड़े शक्तिशाली तत्व उनसे प्रकट हुए।

शिवपुराण का ही कथन है कि शिव प्रकृति और पुरूष दोनों से परे हैं।

यह महेश्वर अपनी इच्छा शक्ति द्वारा सृष्टि की रचना करते हैं। श्रुति का वचन है- ‘मायां तु प्रकतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।’

शिव की यह शक्ति दो रूप में कार्य करती है- 1 मूल प्रकृति और 2 दैवी प्रकृति। गीता में मूल प्रकृति को अपरा-प्रकृति कहा है, जिससे पंचभूत आदि दृश्य पदार्थों की उत्पत्ति हुई। परा-प्रकृति कहा है, जिससे पंचभूत आदि दृश्य पदार्थों की उत्पत्ति हुई। परा-प्रकृति चैतन्य शक्ति है जो इस अपरा-प्रकृति को नाम रूप में परिवर्तित करती है। अपरा-प्रकृति को ‘अविद्या’ और परा-प्रकृति को ‘विद्या’ कहते हैं। परा-प्रकृति को ‘पुरूष’ भी कहते हैं। इन दोनों प्रकृतियों के नायक और प्रेरक श्रीशिव-महेश्वर हैं।

माया प्रकृतिरूदि्दष्टा पुरूषो माययावृत‘। सम्बन्धो मलकर्मभ्यां शिव: प्रेरक ईश्वर।।

शिव त्रिदेवों से प्रथक हैं-

सगुण अर्थात मायासंवलित ब्रह्मा जिनकी पुरूष संज्ञा है, शिव की इच्छा के अनुसार गुणों के क्षोभ रजोगुण से ब्रह्मा, सत्व से विष्णु और तम से रूद्र हुए। ये तीनों ब्रह्माण्ड के त्रिदेव हैं। इन्हीं के लिए कहा जाता है- तीन देव रक्षा करें, ब्रह्मा, विष्णु, महेश। शिव अनेक कोटि ब्रह्माण्डों के नायक है।

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