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शिव की मानस पूजा

शिव की मानस पूजा

श्रीशिव की मानस पूजा

मन द्वारा कल्पित सामग्री द्वारा की जाने वाली पूजा को ‘मानस पूजा’ कहा जाता है। इस मानसिक पूजा को सामान्य पूजन से हजार गुणा अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। मानस पूजा पहले अथवा बाद में सुविधानुसार की जा सकती है। मनः कल्पित यदि एक फूल भी चढ़ा दिया जाए तो वह करोड़ों बाहरी फूलों के चढ़ाने से अधिक महत्वपूर्ण होता है। इसी प्रकार मानस पूजा व चंदन,धूप,दीप नैवेद्य भी भगवान को करोड़ गुना संतोष दे सकते हैं। अतः मानस पूजा का अभ्यास अत्यंत आवश्यक है।

मानस पूजा के महत्व को आदिगुरु शंकराचार्य ने भी वर्णन किया है। भगवान शिव को मन में कल्पित रत्नों के आसन पर विराजमान करके भक्त शीतल जल से स्नान कराए, नाना रत्नों से अलंकृत दिव्य वस्त्र धारण करवाकर कस्तूरी गंध से समन्वित चंदन लगाकर चमेली, जूही, चंपक तथा बिल्वपत्र अर्पित कर धूप-दीप दिखाकर प्रार्थना करें-

                हे दयानिधे, पशुपते! मेरी मानस पूजा को आप सादर ग्रहण कीजिए।

पुष्प आदि से शिव पूजा विधान

जो लक्ष्मी की प्राप्ति की कामना करता हो वह कमल, बिल्वपत्र, शतपत्र और शंखपुष्प से भगवान शिव की पूजा करे। यदि एक लाख की संख्या में इन पुष्पों द्वारा भगवान शिव की पूजा सम्पन्न हो जाए तो सारे पापों का नाश होता है और लक्ष्मी की भी प्राप्ति हो जाती है] इसमें कोई संशय नहीं है। शास्त्रों ने बीस पुष्पों का एक *प्रस्थ बताया है। एक सहस्र बिल्वपत्रों को भी एक *प्रस्थ’ कहा गया है। जब इस संख्या में पुष्पों से शिव की पूजा हो जाती है तब सकाम भक्त अपने सम्पूर्ण अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है। यदि उपासक के मन में कोई कामना नहीं हो तो वह इस पूजा से शिव स्वरूप हो जाता है।

कहा गया है कि पंचाक्षर मंत्र का एक लाख जप करने से शरीर की शुद्धि होती है। दूसरे लाख जप से पूर्वजन्म की बातों का स्मरण होता है। तीसरा लाख पूर्ण होने पर सम्पूर्ण काम्य वस्तुएं प्राप्त होती हैं। चौथे लाख से स्वप्न में भगवान शिव का दर्शन होता है और पांचवे लाख का जप ज्यों ही पूरा होता है भगवान श्ज्ञिव उपासक के सामने साक्षात् प्रकट हो जाते हैं। इसी मंत्र का दस लाख जप पूर्ण हो जाए तो सम्पूर्ण फलों की सिद्धि प्राप्त हो जाती है।

बिल्व का माहात्मय

यह बिल्व वृक्ष महादेव का ही स्वरूप है। देवताओं ने भी इसकी स्तुति की है। जगत में जितने प्रसिद्ध तीर्थ तथा पवित्र स्थान हैं] वे सब बिल्व के मूल में निवास करते हैं क्योंकि बिल्व-मूल में लिंग रूपी अव्यय महादेव का वास रहता है। इसीलिए जो पुण्यात्मा इसकी पूजा करता है वह निश्चय ही शिवत्व और शिवधाम को प्राप्त कर लेता है। बिल्व-मूल में जो शिवलिंग पर जल अर्पित करता है मानो वह सब तीर्थों में स्नान कर चुका है, वह परम् पवित्र हो जाता है। इस बिल्व की जड़ के उत्तम थाले को जल से भरा हुआ देखकर महादेव पूर्णतः प्रसन्न होते हैं। जो मनुष्य पुष्प,गंध आदि से बिल्व के मूल भाग की पूजा करता है, वह मृत्यु के बाद शिवलोक को प्राप्त होता है और इस लोक में भी उसे संतान तथा सुख की प्राप्ति होती है।

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