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जगदगुरु शिव

श्रीशिव के प्रति असंख्य प्राणियों की अगाध श्रद्धा इस बात का स्वतः ही परिचायक है कि वह समस्त कल्याण कारी व जगत पूजनीय हैं। श्रीशिव का एक बृहत परम् कल्याणकारी कार्य इस विश्व में शिव जगदगुरु के रूप में नाना प्रकार की विद्या योग, ज्ञान, भक्ति आदि का प्रचार करना है । जो उनकी कृपा के बिना यथार्थ रूप में प्राप्त नहीं हो सकता। श्रीशिव केवल जगदगुरु ही नहीं हैं अपितु अपने कार्य-कलाप आहार-विहार और संयम-नियम आदि द्वारा जीवन्मुक्त के लिए आदर्श हैं। लिंगपुराण के अध्याय 7 में और शिवपुराण की वायवीय संहिता के पूर्वभाग में शिव के योगाचार्य होने का और उनके शिष्य-प्रशिष्य का विशद वर्णन है-

वेदों में शिवतत्व

शिवतत्व तो एक है ही है- ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्मा’, उस अद्वय-तत्व के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं- ‘एकमेव सत्। नेह नानास्ति किंचन।’ किन्तु उस अद्वय तत्व के नाम अनेक होते हैं- ‘एक’ सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।’ अर्थात उस अद्वय-तत्व को अनेक नामों से पुकारते हैं।
शिव ही ब्रह्मा हैं- शवेताश्वतरोपनिशद के प्रारम्भ में ब्रह्मा के सम्बंध में जिज्ञासा उठायी गयी है। पूछा गया है कि जगत का कारण जो ब्रह्मा है, वह कौन है?
किं कारणं ब्रह्मा? श्रुति ने आगे चलकर इस ‘ब्रह्मा’शब्द के स्थान पर ‘रूद्र’और शिव शब्द का प्रयोग किया है-‘एको हि रूद्रः, ‘स-- शिवः किया है-‘एको हि रूद्रः, ‘स-- शिवः

लिंगमहापुराण और भगवान शिव

लिंग पुराण में शिव अविनाशी, परब्रह्मा, निर्दोष, सर्वसृष्टि के स्वामी, निर्गुण, अलख, ईश्वरों के भी ईश्वर, सर्वश्रेष्ठ, विश्वम्भर और सृष्टि के स्रष्टा, पालक व संहारकर्ता है। वे परब्रह्मा, परमात्मा आरै परज्योति हैं। विष्णु और ब्रह्मा उनसे पैदा हुए हैं। समस्त सृष्टि के आदि कारण शिव ही हैं। सभी भगवानों की पूजा मूर्ति के रूप में की जाती है, लेकिन भगवान शिव ही है जिनकी पूजा लिंग के रूप में होती है। शिवलिंग की पूजा के महत्व का गुण-गान कई पुराणों और ग्रंथों में पाया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिवलिंग पूजा की परम्परा कैसे शुरू हुई। सबसे पहले किसने भगवान शिव की लिंग रूप मे पूजा की थी और किस प्रकार शिवलिंग की पूजा की परम्परा शुरू हुई, इससे संबंधित एक कथा लिंगमहापुराण में है।

शिव और शक्ति

शिव शब्द का अर्थ है कल्याण और ‘शं का भी अर्थ है कल्याण तथा ‘कर का अर्थ है करने वाला, अर्थात शंकर। शिव, अद्वैत कल्याण, आनंद- ये सारे शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं। शिव ही ब्रह्मा है। ब्रह्मा ही शिव है। वही परब्रह्म अथवा परमतत्व है। इसी तत्व को संक्षेप में दर्शनशास्त्र, के तीन महान आदर्श- सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् के रूप में कहा गया है। ब्रह्मा जगत के जन्मादि का कारण है। श्रुति के अनुसार सृष्टि के पूर्व कुछ भी नहीं था, केवल शिव ही था। शिव की शक्ति भी प्राणियों के कल्याण के लिए तत्पर रहती है।

वेदों मे शिवोपासना

जब प्रलयरूप समाधि मे न दिन था न रात्रि थी, न कार्य-कारण ही था, तब सब प्रकार के आवरण से रहित तुरीयस्वरूप एक शिव ही था।’ जब सब प्रपच अव्यक्त में लय हो जाता है और प्राणशक्ति निर्विशेष रूप से उमा में ओत-प्रोत होती है- कार्य कारण से रहित शव की तरह अनंत शक्तिमय शमशान में शयन करती है, तब अनन्ताकाशात्मक शमशान व्यापी एक शिव ही अवशिष्ट रहता है, उसके समान न कोई दूसरा हुआ है, न होगा।‘जब प्रलयरूप समाधि मे न दिन था न रात्रि थी, न कार्य-कारण ही था, तब सब प्रकार के आवरण से रहित तुरीयस्वरूप एक शिव ही था।