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शिव पुराण में शिवतत्व शिव पुराण में शिवतत्व

देवों में देव महादेव सदाशिव भी हैं। प्रलय का अवसान होने पर पुन: सृष्टि के प्रारंभ पूर्व जब परब्रह्म सृष्टयुन्यमुख होते हैं, तब वे परमेश्वर(परात्पर) सदाशिव कहलाते हैं। वहीं सृष्टि के मूल कारण हैं मनुस्मृति में इन्हें ‘स्वयम्भू’ भी कहा है।
परमेश्वर शिव-देवों में देव महादेव सदाशिव भी हैं। प्रलय का अवसान होने पर पुन: सृष्टि के प्रारंभ पूर्व जब परब्रह्म सृष्टयुन्यमुख होते हैं, तब वे परमेश्वर(परात्पर) सदाशिव कहलाते हैं। वहीं सृष्टि के मूल कारण हैं मनुस्मृति में इन्हें ‘स्वयम्भू’ भी कहा है।

शिव तत्व रहस्य

शंकर जी को जप करते देख पार्वती को आश्चर्य हुआ कि देवों के देव , महादेव भला किसका जप कर रहे हैं। पूछने पर महादेव ने कहा , ' विष्णुसहस्त्रनाम का। ' पार्वती ने कहा , इन हजार नामों को साधारण मनुष्य भला कैसे जपेंगे ? कोई एक नाम बनाइए , जो इन सहस्त्र नामों के बराबर हो और जपा जा सके। महादेव ने कहा- राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे , सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने। यानी राम-नाम सहस्त्र नामों के बराबर है। भगवान शिव , विष्णु , ब्रह्मा , शक्ति , राम और कृष्ण सब एक ही हैं। केवल नाम रूप का भेद है , तत्व में कोई अंतर नहीं। किसी भी नाम से उस परमात्मा की आराधना की जाए , वह उसी सच्चिदानन्द की उपासना है। इस तत्व को न जानने के कारण भक्तों में आपसी मतभेद हो जाता है।

पंच केदार

शास्त्रों में उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम का बड़ा ही महात्म्य बताया गया है। केदारनाथ के अलावा यहां चार और केदार हैं जिनका धार्मिक महत्व केदारनाथ के बराबर है, हालांकि यहां हर कोई आसानी से नहीं जा पाता पर जो जाता है वह स्वयं ही शिवमय हो जाता है। इन सभी धामों के दर्शन से व्यक्ति की कामना पूर्ण होती है। इन स्थानों में तुंगनाथ के महादेव, रूद्रनाथ, श्रीमध्यमहेश्वर एवं कल्पेश्वर प्रमुख हैं। भगवान शिव के ये चार स्थान केदारनाथ के ही भाग हैं। विश्व में उत्तराखण्ड को एक विशेष स्थान प्राप्त है। इसकी हरियाली भूमि को देवताओं की पवित्र भूमि का कहा जाता है। यहां विभिन्न रूप में हमारे अराध्य भगवान्, देवी देवताओं के स्थान, मंदिर स्थापित हैं। अपनी इन्हीं अप्रतिम विशेषताओं के चलते उत्तराखंड की भूमि एक तरह से हिन्दू संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती प्रतीत होती है। यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ जैसे कई सिद्ध तीर्थ स्थल हैं।

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

शिव की मानस पूजा

मन द्वारा कल्पित सामग्री द्वारा की जाने वाली पूजा को ‘मानस पूजा’ कहा जाता है। इस मानसिक पूजा को सामान्य पूजन से हजार गुणा अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। मानस पूजा पहले अथवा बाद में सुविधानुसार की जा सकती है। मनः कल्पित यदि एक फूल भी चढ़ा दिया जाए तो वह करोड़ों बाहरी फूलों के चढ़ाने से अधिक महत्वपूर्ण होता है। इसी प्रकार मानस पूजा व चंदन,धूप,दीप नैवेद्य भी भगवान को करोड़ गुना संतोष दे सकते हैं। अतः मानस पूजा का अभ्यास अत्यंत आवश्यक है।