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महावतार बाबाजी

येसुमसीह सदृश संत एवं अमर, अक्षय योगी महावतार बाबाजी के सशरीर उपस्थिति का परिचय सन् 1946 में प्रकाशित अपनी चिर्प्रतिष्ठित पुस्तक योगी कथामृत के माध्यम से परमहंस योगानन्द ने किया |आधुनिक भारत के महानतम योगियों में से एक, योगानंद ने बताया कि किस प्रकार हिमालय में वास करते हुए बाबाजी ने सदियों से आध्यात्मिक विभूतियों का मार्गदर्शन किया है | बाबाजी एक महान सिद्ध हैं जो साधारण मनुष्य कि सीमाओं को तोड़ कर समस्त मानव मात्र के आध्यात्मिक विकास के लिये चुपचाप काम कर रहे हैं | बाबाजी आत्मप्रचार से दूर नेपथ्य में रह कर योग साधकों को इस तरह सहायता करते हैं कि कई बार साधकों को उनके बारे में मालूम तक नहीं रहता | परमहंस योगानन्द ने ये भी बतलाया है कि सन् 1861 में लाहिड़ी महाशय को क्रिया योग के नाम से प्रसिद्ध अति प्रभावशाली तकनीकों की शिक्षा देने वाले बाबाजी ही हैं |

श्री हैड़ाखान बाबा

उत्तरी हिमालय में कूर्मांचल क्षेत्र है। इसे कुमायूं भी कहा जाता है। इसकी पर्वतमालायें दूर-दूर तक फैली हैं। इसकी तलहटी में स्थापित है हैड़ाखान सिद्धाश्रम धाम। गॉंव के लोगों ने तथा पास के अन्य क्षेत्रीय निवासियों ने भी बाबा हैड़ाखान के जन्मस्थान्, नाम गॉंव परिवार सभी की खूब छानबीन की किंतु कहीं भी कोई आधारभूत जानकारी नहीं मिली। बाबा जैसे अनामी थे वैसे ही उनके मॉं बाबा, जन्म स्थान, गॉंव का भी पता नहीं था। उस समय भले ही ये सब रहस्य रहा हो परंतु कालांतर में बाबा के सम्पर्क में आने, उनके चमत्कार देखने तथा उनकी अपरिमेय शक्ति का आंकलन करने पर क्षेत्रीय सभी लोगों ने उन्हे अवतारी पुरूष के रूप में सम्मान दिया, उनका यशोगान किया।

हैड़ाखान सिद्धाश्रम के शिवस्वरूप 1008 श्री मौनी बाबा

संतो के विषय में कहा गया है कि ‘‘ जयंति ते सुकृतिनो ब्रह्मा वेत्ता तपस्वना:। नास्ति येयाम् यश: काये जरा मरणजम् भयम्।’’ वे संत पुरूष धन्य हैं, जो ब्रह्म ज्ञान को जान चुके हैं, जिनकी यश रूपी काया को न तो वृद्धावस्था का भय है, नही मृत्यु का। संतो में ऐसे ही संत हुए हैं, श्री हैड़ाखान सिद्धाश्रम सीतलाखेत, अल्मोड़ा के परम् पूज्नीय शिवस्वरूप 1008 श्री मौनी बाबा। उनका असल नाम तो किसी को ज्ञात नहीं किंतु लगातार 60 वर्षों तक मौन साधना की इसलिए मौनी बाबा के नाम से ही विख्यात हुए।  बाबा का ज्यादातर जीवन निराहार व निर्जल ही बीता बताया जाता है। पावन नगरी रिषिकेश के एक उच्च कुलीन ब्राह्मण परिवार के आयुर्वेदाचार्य और राजवैद्य के घर सन् 1880 में जन्मे। ग्यारह वर्ष की अल्पायु में स्थानीय शिक्षा समाप्त कर वे बनारस गये। वहां गंगा घाट पर भेंट हुई श्री साम्ब सदाशिवरूप 1008 श्री हैड़ाखान महाराज से।